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बिहार के सारण में ऊ भइल रहे जवन जलियांवाला बाग़ में ना हो सकल : मढ़ौरा गोरा हत्याकांड

  ओने अंग्रेजन के गोली ऐने किसानन के टोली गूंजे जय हिन्द के बोली उ मरहौरा में ....     ई मास्टर अजीज द्वारा गावल खाली एगो गीत ना ह बलुक इतिहास के उ दस्तावेज ह जवन खाली अइसन कुछ गीत में दब के रह गइल बा। आज हमनी अइसने गुमनाम दस्तावेज में से भारतीय स्वाधीनता संग्राम के कुछ अइसन क्रांतिकारियन के याद कइल जाई जेकरा के भूला दिहल गइल बा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम खातिर अगस्त महीना के बहुत मोल बा। 15 अगस्त के आजादी त मिलबे कईल बाकी एकरा अलावा अगस्त क्रांति केकरा भोर पड़ा सकेला। द्वितीय विश्व युद्ध में समर्थन लेला के बादो जब अंग्रेज़ भारत के स्वतंत्र करे खातिर तइयार ना भइलें तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में आजादी के अंतिम लड़ाई के बिगुल फूँक दियाईल जवना से ब्रितानिया हुकूमत में दहशत फइल गइल। बहुत जल्दी ई देशव्यापी आन्दोलन के रूप ले लेलस , ओही क्रम में सन 1942 में 18 अगस्त के दिन मढ़ौरा के ...
  "तेरी हिम्मत कैसे हो गई मेरे टॉमी को कुत्ता कहने की? हाऊ डेयर यू..."मालिनी गुस्से से आग बबूला हो गई थी। "बहन जी आप भी कमाल करती हैं कुत्ते को कुत्ता न कहें तो क्या कहें?" आदमी सकपकाया हुआ सा था। मालिनी उसके तरफ उंगली दिखाते हुए बोली-" इसका नाम टॉमी है...कुत्ता नहीं...ये मेरे बेटे जैसा है.....यू स्टुपिड, वी आर एनिमल लवर्स.." इसपर वो आदमी मुस्कुराते हुए बोला-" असल मे आप इसको सिखाओ की जब कोई अनजान आदमी मिले तो ये उसको अपना नाम बताए या फिर इसके गले मे इसका नेमप्लेट लगा दो।" इतना बोलकर वो हंसता हुआ चला गया और मालिनी घंटों तक अंग्रेजी में उसको गालियां देती रही। सोसाइटी का गार्ड दूर से  सब देख रहा था, पास आने पर उसने भी पूछ ही लिया- "क्या हो गया था मैडम?" "स्टुपिड था कोई, इनलोगों के सीने में दिल की जगह पत्थर होता है शायद। खुद देख के चल नहीं सकते और  चोट लगा दी टॉमी को.....और तो और, सॉरी बोलने की जगह कह रहा है कि मैडम अपने कुत्ते को रोड से अलग हटाकर ले चलिए....जैसे इनके बाप की सड़क हो..." गार्ड मन्द-मन्द मुस्कुराता रहा और मालिनी भुनभ...
  "हं मां, नहीं सब ठीक है, अभी पार्टी खत्म हुए बस एक घंटा हुआ.....नहीं कोई बहुत बड़ी पार्टी नहीं थी...बस इनके कुछ दोस्त थे और दीदी-जीजा जी.....हं बहुत मजा आया...ठीक है माँ अब जा रहे हैं सोने....सुबह उठ के बहुत सारा काम होगा...पूरा घर फैला हुआ है...ठीक है, प्रणाम माँ.."- फ़ोन रखते हुए शालू ने किचन की लाइट बन्द की और बेडरूम में गई।    शालू और चंदन की शादी की दूसरी सालगिरह थी आज। चंदन एक सामान्य आदमी था। एक कपड़े के स्टोर में मामूली अकाउंटेंट की भला क्या औकात! जितना कमाता उसमे घर चलाना भी मुश्किल रहता। लेकिन गांव में लोगों को ये लगता है कि शहर में काम कर रहा है तो लड़का अच्छा ही होगा, अच्छा कमाता होगा और कुछ नहीं तो कम से कम उसकी बेटी को तो शहर में ही रखेगा न। यही सोचकर शालू के मां-बाप ने चंदन से उसकी शादी कर दी थी।   शालू के पिताजी भी सिंचाई विभाग से रिटायर्ड थे चार बेटियों की शादी में दहेज देकर टूट गए थे इसलिए पांचवी बेटी में भी दहेज की कमी के कारण सामान्य से लड़का ही मिला था। इस कहानी में आगे बढ़ने से पहले दो बातें आपको बता देना जरूरी समझता हूं। पहला की हमारे देश में बेटे ...
  सुबह-सुबह का समय था, चिड़ियों के कलरव से वातावरण में मिसरी घुल रही थी। श्याम नहा-धोकर तैयार हो चुका था। आज उसे मां की अस्थियों को विसर्जित करने संगम जाना था। हार से लिपटी हुई कल्याणी की तस्वीर दीवार पर लटक रही थी जिसके ठीक नीचे एक टेबल पर कुछ अगरबत्तियां जल रही थी। उसी के बगल में लाल कपडेसे लिपटा हुआ जो कलश था उसी में कल्याणी की अस्थियां थी। श्याम निकला, मां की तस्वीर को प्रणाम करके कलश लेकर स्टेशन निकल पड़ा।       श्याम की आंख खुली तो संगम पहुंच चुका था। स्टेशन से बाहर निकलकर रिक्शेपर बैठ वो घाट पर पहुंचा और नाव में बैठ बीच धार की तरफ बढ़ा। जाते हुए उसने महसूस किया कि कोई बूढ़ी औरत उसके तरफ देख रही है। जब वो अस्थिविसर्जन करके लौटा तो उस बूढ़ी महिला ने बड़े संकोच से उससे कुछ पैसे मांगे। उसने बताया कि वो भूखी है। श्याम ने उससे ज्यादा बात नहीं कि और चुपचाप सामने वाले ढाबे में चलने का इशारा कर चल पड़ा। उसने देखा कि वो महिला धीरे-धीरे लेकिन एक खुशी के साथ आ रही थी। श्याम ने उसे बिठाया और दो जगह खाना मंगाया। पहले तो उसे लगा कि ये कोई भिखारन है जिनका काम ही पैसे मांगन...
ब्लू जीन्स और सफेद शर्ट में मैं हमेशा ही अच्छा लगता हूँ लेकिन आज बहुत अच्छा लग रहा था। कारण क्या था ये तो मुझे भी नहीं पता, शायद इस लिए की आज मैं अपने पसंदीदा कहानी 'नाचनेवाली' जो कि प्रतिलिपि पर मेरी कहानियों में सबसे ज्यादा बार पढ़ी गई हैं, के ऊपर शार्ट फ़िल्म करने जा रहा था। इस शार्ट फ़िल्म को करने से पहले बहुत रिसर्च भी करना पड़ा था। एक दिन की बात है इसी रिसर्च के सिलसिले में मैं तालपुर गया। मेरे एक रिश्तेदार ने तालपुर के एक बड़े समाजसेवी श्री विमल कुमार से मेरी बात कराई थी। विमल जी तालपुर के चर्चित व्यक्ति थे। समाजसेवा में जीवन गुजार दिया था उन्होंने। उन्होंने नाचनेवालियों के बच्चों पर बहुत काम किया था। जिसके लिए राज्य सरकार से पुरस्कार भी मिला था। इस तरह के हस्ती से मिलकर मन बहुत खुश हुआ।        विमल जी नाचनेवालियों के बच्चों को पढ़ाने, स्कूल भेजने, खेलने-कूदने और आगे बढ़ाने में बहुत मदद करते थे। विकल्प इनके संस्था का नाम था जो इस विषय पर काम करती थी। बड़े-बड़े नेताओं के साथ-साथ बड़े अधिकारियों से भी इनकी जान पहचान थी। नाचनेवाली औरतें भी इनको बहुत अच्छे से जानत...