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ब्लू जीन्स और सफेद शर्ट में मैं हमेशा ही अच्छा लगता हूँ लेकिन आज बहुत अच्छा लग रहा था। कारण क्या था ये तो मुझे भी नहीं पता, शायद इस लिए की आज मैं अपने पसंदीदा कहानी 'नाचनेवाली' जो कि प्रतिलिपि पर मेरी कहानियों में सबसे ज्यादा बार पढ़ी गई हैं, के ऊपर शार्ट फ़िल्म करने जा रहा था।

इस शार्ट फ़िल्म को करने से पहले बहुत रिसर्च भी करना पड़ा था। एक दिन की बात है इसी रिसर्च के सिलसिले में मैं तालपुर गया। मेरे एक रिश्तेदार ने तालपुर के एक बड़े समाजसेवी श्री विमल कुमार से मेरी बात कराई थी। विमल जी तालपुर के चर्चित व्यक्ति थे। समाजसेवा में जीवन गुजार दिया था उन्होंने। उन्होंने नाचनेवालियों के बच्चों पर बहुत काम किया था। जिसके लिए राज्य सरकार से पुरस्कार भी मिला था। इस तरह के हस्ती से मिलकर मन बहुत खुश हुआ।

       विमल जी नाचनेवालियों के बच्चों को पढ़ाने, स्कूल भेजने, खेलने-कूदने और आगे बढ़ाने में बहुत मदद करते थे। विकल्प इनके संस्था का नाम था जो इस विषय पर काम करती थी। बड़े-बड़े नेताओं के साथ-साथ बड़े अधिकारियों से भी इनकी जान पहचान थी। नाचनेवाली औरतें भी इनको बहुत अच्छे से जानती थीं। तालपुर वैसे तो नाचनेवालियों का घोषित मुहल्ला था और अघोषित वेश्यालय भी।

मुझे लगा कि मेरे इस प्रोजेक्ट के लिए विमल जी से परफेक्ट  कोई और हो ही नहीं सकता। अब मैं रोज उनके साथ अलग-अलग ठिकानों पर जाने लगा। ठिकाना इसलिए क्योंकि वो घर तो हो ही नहीं सकता। लोग कुछ देर के मनोरंजन के लिए वहां आते थे। वो मुझे उन ठिकानों पर भी ले गये जो शहर के सबसे महंगे और मशहूर ठिकाने थे। यही कुछ 16 से 25 साल तक कि लड़कियां फिल्मी गाने पर नाच रही थी और धीरे-धीरे अपने शरीर से कपड़े कम करती जा रही थीं। अंत मे तो बिल्कुल ही नग्न अवस्था में नाचने लगी। दर्शकदीर्घा में सबके हाथों में नोट और शराब के प्याले। ये मंज़र मैं पहली बार देख रहा था। अवाक भी था और लज्जित भी।

कार्यक्रम खत्म होने के बाद विमल जी मुझे बाहर बैठने को बोल अंदर गए। आधे घंटे तक मेरी मेहमान नवाज़ी में कोई कमी नहीं हुई तब तक विमल जी भी आ गए। उन्होंने मुझे 4-5 लड़कियों से मिलवाया और बताया कि ये आप सबके।ऊपर एक फ़िल्म बना रहे हैं। ये वही लड़कियां थी जो कुछ देर पहले बिन कपड़ो के नाच रही थीं। मैं शर्मिंदगी से भरा हुआ उनसे नज़र भी नहीं मिला पा रहा था। लेकिन आया तो था रिसर्च के लिए यह सोंचकर सहज हुआ और फिर उन सबसे 15-20 मिनट बात हुई।

सबकी कुछ न कुछ कहानी थी। लेकिन एक लड़की पूरे समय एकदम चुप रही वो नाचने के समय भी नहीं दिखी थी। उसको मैंने कई बार पूछा लेकिन मुस्का कर टाल देती। खैर दुबारा वहां आऊंगा जरूर ये सोचकर विमल जी के साथ उस वक़्त तो चला गया। रास्ते मे उन्होंने बताया कि वो महिला उत्थान के लिए क्या-क्या करते हैं। उनके और उनके बच्चों के हक़ के लिए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया।

   इन्हीं बातों ही बातों में हम उनके घर पहुंच गए।  घर बहुत आलीशान था बल्कि उसे कोठी कहा जाए तो कम नहीं। मैं सोफ़े पर बैठ गया वो भी सामने वाले सोफ़े पर बैठ गए। बैठते ही उन्होंने चाय के लिए आवाज़ लगाई फिर बातों में लग गए। इस दरम्यान पता चला कि उनके दोनों बेटे ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे हैं। बेटी नहीं है। चाय आने का तरीका अजीब था...चाय आने इसलिए क्योंकि उसे लाया गया हो ऐसा नहीं लग रहा था। अचानक पायल की छमक आई और पर्दे के पीछे से चाय का ट्रे बाहर आया। उस औरत के हाथ ही दिखे केवल। विमल जी खुद गए और चाय ले आये। चाय पीते-पीते मैंने पूछ भी लिया। ये कौन हैं?

उनका जवाब सुनकर चाय बेस्वाद लगने लगा। उन्होंने बताया कि ये उनकी पत्नी है। मैंने पूछ ही लिया- ये पर्दे से बाहर क्यों नहीं आईं?

विमल जी ने चाय में पड़ आई मोटी पपड़ी को जीभ से चाटते हुए बोले- "घर की इज्जत है पर्दे में ही ठीक लगती है, इनको सिर पर नहीं बिठाना चाहिए।"

* समाप्त *


 

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