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मार्च, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
रंगमंरंगमच च को "लाल" की ज़रूरत इसमें कोई संदेह  कि हरेक कला मनष्य के अंतर को बाह्य से जोरने का सशक्त माध्यम है । अर्थात उसके आतंरिक भावों,संवेदनाओं एवं अनुभव-अनुभूतियों कि अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में होती है। निस्संदेह रंगमंच उन माध्यमों में एक सशक्त माध्यम है। इतिहास कि कई महत्वपूर्ण क्रांतियों में रंग्मंच्का मुख्या योगदान रहा है। समय के साथ-साथ लोगों कि पसंद बदलती गई और पसंदों के अनुरूप रंगमंच भी बदला इक समय जब रंगमंच क्रन्तिकारी हुआ करता था धीरे-धीरे हास्य बनता गया। इसका प्रमुख कारण है इसके प्रति लोगों का रुझान कम होना । ऐसी स्थिति में दर्शकों कि भीर जुटाने के चक्कर में रंगमंच ने भी हास्य पडोसना शुरू कर दिया। इसका एक और प्रमुख कारण है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसी सरकारी संस्थाओं ने नाट्य मंचन को महंगा बना दिया । छोटे-छोटे थिएटर ग्रुप अर्थाभाव के कारण डूबता गया फिर जीवित रहने के लिए सस्ते और भीड़ जुटाऊ नाटकों का मंचन होने लगा।दिल्ली जैसे शर में प्रत्येक वर्ष करीब २०-२५ थिएटर ग्रुपों का रजिस्ट्रेशन होता है लेकिन साल के अंत तक १ या २ ही टिक पते हैं । मंडी हाउस ...

रंगमंच और भोजपुरी

रंगमंच और भोजपुरी किसी भी देश या स्थान के रहनेवालों कीअपनी सभ्यता और संस्कृति होती है। उसी सभ्यता और संस्कृति से वहाँ के लोगों की पहचान होती है। सभ्यता और संस्कृति के कई तत्व होते हैं लेकिन हम यहाँ रंगमंच पर प्रकाश डालने की कोशिश करते हैं । क्योंकि भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने कहा है -- "निज भाषा के उन्नति उहे सब उन्नति के मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटतन हिय के शूल। " इसके अलावा इतिहास भी इस बात का गवाह है किदुनिया में उसी समाज को मान -सम्मान मिला है जिसने अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व किया है और उसके संरक्षण तथा विकास के लिए प्रयासरत रहा है। रंगमंच ने इस क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया है। भोजपुरी रंगमंच बहुत बाद कि दें है उससे पहले यहाँ लोक शैली के नाटक और नृत्य हुआ करते थे । धीरे -धीरे विकसित होती हुई ये ये शैलियाँ रंगमंच में तब्दील हो गई। इसके बाद भी हिंदी, बांग्ला ,मराठी या किसी अन्य भाषा के रंगमंच के अपेक्षा भोजपुरी रंग्मंचुतना फल-फुल नहीं पाया। इसके बावजूद भी जितने भोजपुरी रंगमंच हैं,अपने-अपने स्तर पर अडिग और प्रयासरत है। हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में भोजपुरी रंम...

भगतसिंह

जय भारत जय भगत निस्संदेह भगतसिंह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सर्वाधिक प्रसिद्ध शहीदों में से एक रहे हैं। हलाकि अधिकतर उन्हें गोली चलाने वाले युवा राष्ट्रवादी कि छवि से अलग नहीं देख पातेइसका कारन शायद ये है कि उनकी यही छवि उपनिवेशिक दौर के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज कि गई। लोग भगतसिंह को एक ऐसे शख्स के रूप में देखते थे,जो अपने हिंसात्मक कारनामों से ब्रिटिश शासन को आतंकित कर देता था। उनकी ज़बरदस्त हिम्मत ने उन्हें एक प्रतिमान बना दिया। बह्गात्सिंह को आज भी प्यार और श्रद्धा कि नज़र से देखा जाता है। लेकिन क्या हमे उनकी राजनीती और विचारो के बारे में कुछ पता है? उनके क्रन्तिकारी दृष्टिकोण में स्वाधीन भारत को एक धर्मनिरपेक्ष , समाजवादी और समतावादी समाज में बदलना था। । भगतसिंह को जनता का मुक्त समर्थन उनके सोच क कारन मिला। आज के पश्चिम प्रभावित समाज के युवा शहरों के माल ,मल्टीप्लेक्स और सुविधा संपन्न जीवन में खो गए हैं फिर भी उन्हें अपना वो शहीद आज भी याद है। दिल्ली के कुछ महाविद्यालयों के विद्यार्थियों से भगतसिंह के बरे में मेरी बात हुई। नरेन्द्र सांवरिया (जामिया मिल्लिया इस्लामिया ) १७ अक...