रंगमंच और भोजपुरी किसी भी देश या स्थान के रहनेवालों कीअपनी सभ्यता और संस्कृति होती है। उसी सभ्यता और संस्कृति से वहाँ के लोगों की पहचान होती है। सभ्यता और संस्कृति के कई तत्व होते हैं लेकिन हम यहाँ रंगमंच पर प्रकाश डालने की कोशिश करते हैं । क्योंकि भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने कहा है -- "निज भाषा के उन्नति उहे सब उन्नति के मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटतन हिय के शूल। " इसके अलावा इतिहास भी इस बात का गवाह है किदुनिया में उसी समाज को मान -सम्मान मिला है जिसने अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व किया है और उसके संरक्षण तथा विकास के लिए प्रयासरत रहा है। रंगमंच ने इस क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया है। भोजपुरी रंगमंच बहुत बाद कि दें है उससे पहले यहाँ लोक शैली के नाटक और नृत्य हुआ करते थे । धीरे -धीरे विकसित होती हुई ये ये शैलियाँ रंगमंच में तब्दील हो गई। इसके बाद भी हिंदी, बांग्ला ,मराठी या किसी अन्य भाषा के रंगमंच के अपेक्षा भोजपुरी रंग्मंचुतना फल-फुल नहीं पाया। इसके बावजूद भी जितने भोजपुरी रंगमंच हैं,अपने-अपने स्तर पर अडिग और प्रयासरत है। हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में भोजपुरी रंम...