"तेरी हिम्मत कैसे हो गई मेरे टॉमी को कुत्ता कहने की? हाऊ डेयर यू..."मालिनी गुस्से से आग बबूला हो गई थी।
"बहन जी आप भी कमाल करती हैं कुत्ते को कुत्ता न कहें तो क्या कहें?" आदमी सकपकाया हुआ सा था।
मालिनी उसके तरफ उंगली दिखाते हुए बोली-" इसका नाम टॉमी है...कुत्ता नहीं...ये मेरे बेटे जैसा है.....यू स्टुपिड, वी आर एनिमल लवर्स.."
इसपर वो आदमी मुस्कुराते हुए बोला-" असल मे आप इसको सिखाओ की जब कोई अनजान आदमी मिले तो ये उसको अपना नाम बताए या फिर इसके गले मे इसका नेमप्लेट लगा दो।"
इतना बोलकर वो हंसता हुआ चला गया और मालिनी घंटों तक अंग्रेजी में उसको गालियां देती रही।
सोसाइटी का गार्ड दूर से सब देख रहा था, पास आने पर उसने भी पूछ ही लिया- "क्या हो गया था मैडम?"
"स्टुपिड था कोई, इनलोगों के सीने में दिल की जगह पत्थर होता है शायद। खुद देख के चल नहीं सकते और चोट लगा दी टॉमी को.....और तो और, सॉरी बोलने की जगह कह रहा है कि मैडम अपने कुत्ते को रोड से अलग हटाकर ले चलिए....जैसे इनके बाप की सड़क हो..."
गार्ड मन्द-मन्द मुस्कुराता रहा और मालिनी भुनभुनाते हुए अपने फ्लैट में चली गई।
मालिनी धूप में बैठकर कुत्ते को कंघी कर रही थी और पीछे से आवाज़ आ रही थी -"बहु एक गिलास पानी दे दो...दवाई खानी है।"
वो आवाज़ मालिनी के सास की थी जो पिछले 6 महीनों से बीमार थी और पिछले महीने ही लकवा की शिकार हो गई थीं।
"बहु...एक गिलास पानी दे दो...."
मालिनी खीझ कर खुद से बोली- "अरे ये बुढ़िया मर भी नहीं जाती....नाक में दम कर रखा है...कभी पानी,कभी दवाई, कभी खाना... कभी ये,कभी वो....ओफ़....
"बहु पानी दे दो"
"बहु....पानी...."
"बहु.... दवाई....पानी..."
इसी तरह उस कमरे से धीमी होने तक बुलाने की आवाज़ आती रही और मालिनी को अभी भी उस आदमी पर गुस्सा आ रहा था....वो उसे कोस रही थी-"पता नहीं लोगों के सीने में दिल है या पत्थर?"
-----समाप्त-------
लव कांत सिंह "लव"

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