सुबह-सुबह का समय था, चिड़ियों के कलरव से वातावरण में मिसरी घुल रही थी। श्याम नहा-धोकर तैयार हो चुका था। आज उसे मां की अस्थियों को विसर्जित करने संगम जाना था। हार से लिपटी हुई कल्याणी की तस्वीर दीवार पर लटक रही थी जिसके ठीक नीचे एक टेबल पर कुछ अगरबत्तियां जल रही थी। उसी के बगल में लाल कपडेसे लिपटा हुआ जो कलश था उसी में कल्याणी की अस्थियां थी। श्याम निकला, मां की तस्वीर को प्रणाम करके कलश लेकर स्टेशन निकल पड़ा। श्याम की आंख खुली तो संगम पहुंच चुका था। स्टेशन से बाहर निकलकर रिक्शेपर बैठ वो घाट पर पहुंचा और नाव में बैठ बीच धार की तरफ बढ़ा। जाते हुए उसने महसूस किया कि कोई बूढ़ी औरत उसके तरफ देख रही है। जब वो अस्थिविसर्जन करके लौटा तो उस बूढ़ी महिला ने बड़े संकोच से उससे कुछ पैसे मांगे। उसने बताया कि वो भूखी है। श्याम ने उससे ज्यादा बात नहीं कि और चुपचाप सामने वाले ढाबे में चलने का इशारा कर चल पड़ा। उसने देखा कि वो महिला धीरे-धीरे लेकिन एक खुशी के साथ आ रही थी। श्याम ने उसे बिठाया और दो जगह खाना मंगाया। पहले तो उसे लगा कि ये कोई भिखारन है जिनका काम ही पैसे मांगना इसलिए पैसे देने से अच्छा है खाना खिला देना। लेकिन खाने के दौरान उसे पता चला कि वो अच्छे घर से है लेकिन दो महीने पहले उसका बेटा उसे धोखे से यहां छोड़ गया था। श्याम तो शोक में था ही उसकी आंखों में पानी आने में समय नहीं लगा। लेकिन इन भिखारियों का विश्वास क्यों किया जाये, हर आदमी से अलग कहानी बताते हैं। श्याम उठा, ढ़ाबेवाले को पैसे देने लगा। उसी दौरान उसने ढ़ाबेवाले से उस बूढ़ी महिला के बारे में पूछा। ढ़ाबेवाले ने सत्यापित किया की वो महिला सच बोल रही है। उसने कहा कि ये संगम है बाबू, यहां हर साल और खासकर कुम्भ में लोग अपने बुजुर्ग मां-बाप को छोड़ जाते हैं। वो अनपढ़ बेचारे यही रह जाते हैं भीख मांगने के लिए। मजबूरी में इन्हें यहां बहुत झेलना पड़ता है।
श्याम को अब उसपर दया आने लगी थी। वो वहीं सीढ़ियों पर बैठ गया। उस बूढ़ी महिला को भी बुलाकर बातें करता रहा। लौटते समय वो बहुत खुश था कि जिस संगम में वो मां की अस्थियां बहाने लाया था उसी संगम ने नई माँ दे दी। वो दोनों खुशी से गांव आ गए।
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