मैं भ्रष्टाचार के भविष्य को लेकर निश्चिंत हूं। यह निर्विवाद सत्य है कि सिर्फ हमारे देश में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के लिए तमाम संभावनाएं व सुविधाएं हैं। हममें ही यह हुनर है कि हम कहीं भी, कभी भी करप्शन की बुनियाद रख सकते हैं। क्षेत्र चाहे राजनीति का हो या संस्कृति का, हम कदाचार के बीज पनपा ही लेते हैं। खुद भी खाते हैं और सामने वाले को भी खाने-दबाने का पूरा मौका देते हैं। यह तो भ्रष्टाचार का पवित्र नियम है कि दूसरे की मुट्ठी गर्म किए बिना, अपनी मुट्ठी गर्म नहीं हो सकती।
आज करप्शन पर वही लोग हो-हल्ला मचा रहे हैं, जिन्हें करप्ट होने का मौका नहीं मिला। ज्योंही मौका मिलेगा, वे अपने होंठ सिल लेंगे। यह रीति वर्षों से चली आ रही है। लोग भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए इस ताक में लगे रहते हैं कि उन्हें भी कब मलाई का परमानेंट सोर्स मिल जाए। ऐसा होते ही वह भ्रष्टाचारियों की जमात में शामिल हो जाते हैं। देश में भ्रष्टाचारियों की संख्या इसी कारण बढ़ रही है और बढ़ेगी। कुछ लोग तो करप्शन का विरोध इसलिए कर रहे हैं ताकि चर्चा में आ सकें। वे भ्रष्टाचार की संस्कृति को नकारते हैं। अगर कहीं उनसे करप्शन पर कु छ बोलने को कह दिया जाए, तो वे एकतरफा बातें करते हैं। उसकी गहराई में नहीं जाते। खुद चाहें कितना भी भ्रष्ट या दुराचारी क्यों न बनना चाहते हों, मगर भ्रष्टाचार को कोसे बिना उन्हें नींद नहीं आती। यह बौद्धिक बेईमानी नहीं तो और क्या है?
भ्रष्टाचार की संस्कृ ति को नित नए आयाम देने में हमारे जन-हितैषी राजनेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। सत्ता पाने का मतलब यह नहीं होता कि आप हमेशा जनता के बारे में ही सोचें या उनके सुख-दुख का ख्याल रखें। अपने व अपनों के बारे में भी सोचना पड़ता है। पैसा कहां से आए, कैसे आए इस पर गहन मंथन करना पड़ता है। तमाम तरह की योजनाएं बनानी पड़ती हैं। लोगों को भले ही लगता हो कि सत्ता में रहकर पैसा कमाना बहुत आसान है, पर वास्तव में यह बेहद मुश्किल काम है। यहां बैलेंस बनाकर चलना होता है। छवि को साफ-सुथरा रखना पड़ता है। चेहरे के रूप-प्रतिरूप को साधना-संवारना पड़ता है। अगर विधायक या मंत्री हैं, तो जनता की निगाह में बने रहते हैं। एक बार पद से हट गए तो कोई पूछता नहीं। सोचिए कितना कठिन काम है। छवि भी बनानी है और पैसे भी।
हालांकि बाकी तबकों के लिए चुनौती थोड़ी कम है। जैसे अफसरों के लिए यह रास्ता थोड़ा आसान है। घोटालों में नेता ज्यादा बदनाम होते हैं। अफसरों का नंबर तो बहुत बाद में आता है। हालांकि पकड़़ में तो दोनों नहीं आते। न तो बड़ी मछली फंसती है न ही छोटी। केकड़ों का तो कहना ही क्या। रिश्वतखोर केकड़े हर जगह मौजूद रहते हैं। इसलिए अब भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे रवैये का पर्दाफाश होना चाहिए। बंद होना चाहिए करप्शन का विरोध। आज भी जो लोग ईमानदारी का राग अलापते हैं, वो अपने मन की बात सबको बता दें, तो बेहतर है। अब कुछ लोग ईमानदार रहंे भी तो कौन-सा बड़ा पद्म-पुरस्कार इन्हें मिल गया? बस, दो शब्द यही तो सुनने को मिले- 'फलां बड़े ईमानदार हैं या थे।' पर बंधु आज के समय में महज शब्दों से नहीं अर्थ से पेट भरता है। जिसके पास अर्थ नहीं, वो बेअर्थ है। ईमानदारी से कहूं तो मैं भ्रष्टाचारियों को सभ्यता-संस्कृ ति का ही नहीं अर्थव्यवस्था का भी महानायक मानता हूं। अरे उन्होंने ही तो इकॉनमी को गति दी है। अब पैसे कमाएंगे तो उसे कहीं न कहीं लगाएंगे भी। कोई आलीशान मकान बनाएगा, कोई दुकान बनाएगा। अब इनके लिए ईंट, सीमेंट, रेत, सरिया आदि की बिक्री बढ़ेगी कि नहीं। मजदूरों को काम मिलेगा कि नहीं। बीच-बीच में जब भी खबर आती है कि भारतीयों का अरबों रुपया स्विस बैंकों में जमा है, तो सीना चौड़ा हो जाता है। पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबाकर कहती है -अरे! भारत इतना अमीर है। इससे विश्व बिरादरी में भारत का रुतबा बढ़ा है। ओबामा ने भारत को वर्ल्ड पावर ऐसे ही थोड़े मान लिया है।
आज करप्शन पर वही लोग हो-हल्ला मचा रहे हैं, जिन्हें करप्ट होने का मौका नहीं मिला। ज्योंही मौका मिलेगा, वे अपने होंठ सिल लेंगे। यह रीति वर्षों से चली आ रही है। लोग भ्रष्टाचार का विरोध करते हुए इस ताक में लगे रहते हैं कि उन्हें भी कब मलाई का परमानेंट सोर्स मिल जाए। ऐसा होते ही वह भ्रष्टाचारियों की जमात में शामिल हो जाते हैं। देश में भ्रष्टाचारियों की संख्या इसी कारण बढ़ रही है और बढ़ेगी। कुछ लोग तो करप्शन का विरोध इसलिए कर रहे हैं ताकि चर्चा में आ सकें। वे भ्रष्टाचार की संस्कृति को नकारते हैं। अगर कहीं उनसे करप्शन पर कु छ बोलने को कह दिया जाए, तो वे एकतरफा बातें करते हैं। उसकी गहराई में नहीं जाते। खुद चाहें कितना भी भ्रष्ट या दुराचारी क्यों न बनना चाहते हों, मगर भ्रष्टाचार को कोसे बिना उन्हें नींद नहीं आती। यह बौद्धिक बेईमानी नहीं तो और क्या है?
भ्रष्टाचार की संस्कृ ति को नित नए आयाम देने में हमारे जन-हितैषी राजनेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। सत्ता पाने का मतलब यह नहीं होता कि आप हमेशा जनता के बारे में ही सोचें या उनके सुख-दुख का ख्याल रखें। अपने व अपनों के बारे में भी सोचना पड़ता है। पैसा कहां से आए, कैसे आए इस पर गहन मंथन करना पड़ता है। तमाम तरह की योजनाएं बनानी पड़ती हैं। लोगों को भले ही लगता हो कि सत्ता में रहकर पैसा कमाना बहुत आसान है, पर वास्तव में यह बेहद मुश्किल काम है। यहां बैलेंस बनाकर चलना होता है। छवि को साफ-सुथरा रखना पड़ता है। चेहरे के रूप-प्रतिरूप को साधना-संवारना पड़ता है। अगर विधायक या मंत्री हैं, तो जनता की निगाह में बने रहते हैं। एक बार पद से हट गए तो कोई पूछता नहीं। सोचिए कितना कठिन काम है। छवि भी बनानी है और पैसे भी।
हालांकि बाकी तबकों के लिए चुनौती थोड़ी कम है। जैसे अफसरों के लिए यह रास्ता थोड़ा आसान है। घोटालों में नेता ज्यादा बदनाम होते हैं। अफसरों का नंबर तो बहुत बाद में आता है। हालांकि पकड़़ में तो दोनों नहीं आते। न तो बड़ी मछली फंसती है न ही छोटी। केकड़ों का तो कहना ही क्या। रिश्वतखोर केकड़े हर जगह मौजूद रहते हैं। इसलिए अब भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे रवैये का पर्दाफाश होना चाहिए। बंद होना चाहिए करप्शन का विरोध। आज भी जो लोग ईमानदारी का राग अलापते हैं, वो अपने मन की बात सबको बता दें, तो बेहतर है। अब कुछ लोग ईमानदार रहंे भी तो कौन-सा बड़ा पद्म-पुरस्कार इन्हें मिल गया? बस, दो शब्द यही तो सुनने को मिले- 'फलां बड़े ईमानदार हैं या थे।' पर बंधु आज के समय में महज शब्दों से नहीं अर्थ से पेट भरता है। जिसके पास अर्थ नहीं, वो बेअर्थ है। ईमानदारी से कहूं तो मैं भ्रष्टाचारियों को सभ्यता-संस्कृ ति का ही नहीं अर्थव्यवस्था का भी महानायक मानता हूं। अरे उन्होंने ही तो इकॉनमी को गति दी है। अब पैसे कमाएंगे तो उसे कहीं न कहीं लगाएंगे भी। कोई आलीशान मकान बनाएगा, कोई दुकान बनाएगा। अब इनके लिए ईंट, सीमेंट, रेत, सरिया आदि की बिक्री बढ़ेगी कि नहीं। मजदूरों को काम मिलेगा कि नहीं। बीच-बीच में जब भी खबर आती है कि भारतीयों का अरबों रुपया स्विस बैंकों में जमा है, तो सीना चौड़ा हो जाता है। पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबाकर कहती है -अरे! भारत इतना अमीर है। इससे विश्व बिरादरी में भारत का रुतबा बढ़ा है। ओबामा ने भारत को वर्ल्ड पावर ऐसे ही थोड़े मान लिया है।
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