सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रंगमंरंगमच च को "लाल" की ज़रूरतइसमें कोई संदेह
 कि हरेक कला मनष्य के अंतर को बाह्य से जोरने का सशक्त माध्यम है । अर्थात उसके आतंरिक भावों,संवेदनाओं एवं अनुभव-अनुभूतियों कि अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में होती है। निस्संदेह रंगमंच उन माध्यमों में एक सशक्त माध्यम है।

इतिहास कि कई महत्वपूर्ण क्रांतियों में रंग्मंच्का मुख्या योगदान रहा है। समय के साथ-साथ लोगों कि पसंद बदलती गई और पसंदों के अनुरूप रंगमंच भी बदला इक समय जब रंगमंच क्रन्तिकारी हुआ करता था धीरे-धीरे हास्य बनता गया। इसका प्रमुख कारण है इसके प्रति लोगों का रुझान कम होना । ऐसी स्थिति में दर्शकों कि भीर जुटाने के चक्कर में रंगमंच ने भी हास्य पडोसना शुरू कर दिया। इसका एक और प्रमुख कारण है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसी सरकारी संस्थाओं ने नाट्य मंचन को महंगा बना दिया । छोटे-छोटे थिएटर ग्रुप अर्थाभाव के कारण डूबता गया फिर जीवित रहने के लिए सस्ते और भीड़ जुटाऊ नाटकों का मंचन होने लगा।दिल्ली जैसे शर में प्रत्येक वर्ष करीब २०-२५ थिएटर ग्रुपों का रजिस्ट्रेशन होता है लेकिन साल के अंत तक १ या २ ही टिक पते हैं । मंडी हाउस दिल्ली रंगमंच का पर्याय बन चूका है। यहाँ भी कुछ ही ऐसे ग्रुप हैं जो लगातार सक्रिय रहते हैं। इसके फेहरिश्त में इंदु आर्ट थिएटर और फिल्म सोसाइटी सबसे आगे है। दिल्ली के किसी भी प्रेक्षा गृह में हमेशा इसके २ नाटकों के पोस्टर देखे जा सकते हैं।

रंगमंच के सागर में रानावि जैसी विशाल मछली के सामने इंदु आर्ट, अस्मिता ,दायरा या नटसम्राट जैसी छोटी मछलियाँ अपने अस्तित्व को बचाने में लगी हुई है।बावजूद युवा और निर्भीक रंगकर्मी यासीन खान लगातार "भूमि" और "लाल" जैसी नाटकों के साथ खड़े रहते हैं। "भूमि " उन किसानों कि कहानी है जिसकी जमीनों का अधिग्रहण सर्कार ज़बरदस्ती कर लेती है और नाटक "लाल "उन गरीब आदिवासियों कि संघर्ष कि कहानी है जो आज भी भूखे और पिछरे हैं। यहाँ नक्सलवाद को एक गंभीर समस्या के रूप में दर्शाने कि कोशिश कि गई है.लाल जैसी गंभीर नाटक में भी दर्शकों कि खचाखच भीड़ इस बात का संकेत है कि लोग फिर क्रांति भाहते हैं और हिंदी रंगमंच को ऐसे ही युवा और निर्भीक रंगकर्मियों कि ज़रूरत है।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

खदेरन के पाठशाला 9 : फॉलोवर के बाढ़, अक्ल के अकाल

  ( स्कूल शुरू हो चूका है लेकिन अभी मास्टर साहेब लोग चाय समोसा कचरने में व्यस्त हैं।   बच्चे क्लास को एक साथ क्रिकेट , फुटबाल , कब्बड्डी , कुस्ती के मैदान के साथ- साथ मछली बाजार भी बना के रखे हैं सब ) मोटू - जान जाओ की कल हमारे चाचा एक इंस्टाग्राम का ID बनाये और आज ही 1500 Organic लोग फॉलो कर लिए। ढोंढा - अरे त ई कवन बड़का बात हो गइल , उ सब 1500 लोग तोर घर परिवार आ रिश्तेदार इहे सब में से होइ। मोटू - अरे नानू रे , हमरा परिवार के जवन रहन बा की 50 आदमी फॉलो ना करीहें , ई सब आर्गेनिक ह।   खदेरन - तोर चाचा के नाम अभिजीत चिपके त ना ह ? मोटू - हं उहे हवें हमर चाचा। मंगरु - तोर दादा चाहे दादी में से कोई कबो बापो जनम महाराष्ट्र गइल रहे का रे ? मोटू - ना रे   ! मंगरु - त घेंवड़ा में से तहर चाचा आ गइले महाराष्ट्र में !! मोटू - बोलबे जादा , उहो कॉक्रोच हमहू   कॉक्रोच .... त ओह नाते उ हो गइले हमार चाचा। मंगरु - ...
  "तेरी हिम्मत कैसे हो गई मेरे टॉमी को कुत्ता कहने की? हाऊ डेयर यू..."मालिनी गुस्से से आग बबूला हो गई थी। "बहन जी आप भी कमाल करती हैं कुत्ते को कुत्ता न कहें तो क्या कहें?" आदमी सकपकाया हुआ सा था। मालिनी उसके तरफ उंगली दिखाते हुए बोली-" इसका नाम टॉमी है...कुत्ता नहीं...ये मेरे बेटे जैसा है.....यू स्टुपिड, वी आर एनिमल लवर्स.." इसपर वो आदमी मुस्कुराते हुए बोला-" असल मे आप इसको सिखाओ की जब कोई अनजान आदमी मिले तो ये उसको अपना नाम बताए या फिर इसके गले मे इसका नेमप्लेट लगा दो।" इतना बोलकर वो हंसता हुआ चला गया और मालिनी घंटों तक अंग्रेजी में उसको गालियां देती रही। सोसाइटी का गार्ड दूर से  सब देख रहा था, पास आने पर उसने भी पूछ ही लिया- "क्या हो गया था मैडम?" "स्टुपिड था कोई, इनलोगों के सीने में दिल की जगह पत्थर होता है शायद। खुद देख के चल नहीं सकते और  चोट लगा दी टॉमी को.....और तो और, सॉरी बोलने की जगह कह रहा है कि मैडम अपने कुत्ते को रोड से अलग हटाकर ले चलिए....जैसे इनके बाप की सड़क हो..." गार्ड मन्द-मन्द मुस्कुराता रहा और मालिनी भुनभ...
  सुबह-सुबह का समय था, चिड़ियों के कलरव से वातावरण में मिसरी घुल रही थी। श्याम नहा-धोकर तैयार हो चुका था। आज उसे मां की अस्थियों को विसर्जित करने संगम जाना था। हार से लिपटी हुई कल्याणी की तस्वीर दीवार पर लटक रही थी जिसके ठीक नीचे एक टेबल पर कुछ अगरबत्तियां जल रही थी। उसी के बगल में लाल कपडेसे लिपटा हुआ जो कलश था उसी में कल्याणी की अस्थियां थी। श्याम निकला, मां की तस्वीर को प्रणाम करके कलश लेकर स्टेशन निकल पड़ा।       श्याम की आंख खुली तो संगम पहुंच चुका था। स्टेशन से बाहर निकलकर रिक्शेपर बैठ वो घाट पर पहुंचा और नाव में बैठ बीच धार की तरफ बढ़ा। जाते हुए उसने महसूस किया कि कोई बूढ़ी औरत उसके तरफ देख रही है। जब वो अस्थिविसर्जन करके लौटा तो उस बूढ़ी महिला ने बड़े संकोच से उससे कुछ पैसे मांगे। उसने बताया कि वो भूखी है। श्याम ने उससे ज्यादा बात नहीं कि और चुपचाप सामने वाले ढाबे में चलने का इशारा कर चल पड़ा। उसने देखा कि वो महिला धीरे-धीरे लेकिन एक खुशी के साथ आ रही थी। श्याम ने उसे बिठाया और दो जगह खाना मंगाया। पहले तो उसे लगा कि ये कोई भिखारन है जिनका काम ही पैसे मांगन...