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भगतसिंह

जय भारत जय भगत
निस्संदेह भगतसिंह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सर्वाधिक प्रसिद्ध शहीदों में से एक रहे हैं। हलाकि अधिकतर उन्हें गोली चलाने वाले युवा राष्ट्रवादी कि छवि से अलग नहीं देख पातेइसका कारन शायद ये है कि उनकी यही छवि उपनिवेशिक दौर के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज कि गई। लोग भगतसिंह को एक ऐसे शख्स के रूप में देखते थे,जो अपने हिंसात्मक कारनामों से ब्रिटिश शासन को आतंकित कर देता था। उनकी ज़बरदस्त हिम्मत ने उन्हें एक प्रतिमान बना दिया। बह्गात्सिंह को आज भी प्यार और श्रद्धा कि नज़र से देखा जाता है। लेकिन क्या हमे उनकी राजनीती और विचारो के बारे में कुछ पता है? उनके क्रन्तिकारी दृष्टिकोण में स्वाधीन भारत को एक धर्मनिरपेक्ष , समाजवादी और समतावादी समाज में बदलना था। । भगतसिंह को जनता का मुक्त समर्थन उनके सोच क कारन मिला। आज के पश्चिम प्रभावित समाज के युवा शहरों के माल ,मल्टीप्लेक्स और सुविधा संपन्न जीवन में खो गए हैं फिर भी उन्हें अपना वो शहीद आज भी याद है। दिल्ली के कुछ महाविद्यालयों के विद्यार्थियों से भगतसिंह के बरे में मेरी बात हुई।
नरेन्द्र सांवरिया (जामिया मिल्लिया इस्लामिया )
१७ अक्टूबर १९३० को भगतसिंह,राजगुरु और सुखदेव को फंसी कि सजा हुई थी और २३ मार्च १९३१ को इन तीनों वीरो ने इंक़लाब जिंदाबाद बोलते हुए फंदे को चूमा और शहीद हो गए। इन्होंने अस्सेम्ब्ली में बोम पटका था उसके बाद सांडर्स कि हत्या के जुर्म में इन्हें फंसी दी गई। भगतसिंह ने युवाओं को एक नयी सोंच दी जिससे प्रेरणा लेकर भारत के वीरों ने अपने देश को आज़ाद करवाया। दुःख तो इस बात का है कि भगत सिंह कि जयंती को उतने लोग नहीं जानते जितने गाँधी जयंती या किसी और कि।अगर हम भगत सिंह के नक्से-कदम पर चलें तो बहुत आगे जा सकते हैं।
शिवेन्दु राय (जामिया मिल्लिया इस्लामिया)
युवा स्वंत्रता सेनानी भगतसिंह ने देश कि आज़ादी में अपने प्राणों कि आहुति दी और युवाओं के मन में देश के लिए एक क्रन्तिकारी भावना पैदा कि। जिनकी वज़ह से हमारे देश के युवा देश के विकास में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाना चाह रहे हैं।पश्चिमी सभ्यता का असर युवाओं के मन को कही न कही अपने लक्ष्य से भटका रहा है। अगर हम भगतसिंह के सपनो का समाजवादी भारत चाहते हैं तो हमे अपनी युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता का महत्व समझाना पड़ेगा जो आज लोग भूलते जा रहे हैं। आज के सन्दर्भ में हर युवा को भगतसिंह जैसी सोंच को जगाना होगा तभी देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकेगा।
शहीदों कि मजारों पर लगेंगे हर वर्ष मेले ,
वतन पे मिटने वालों का यही बाकि निशाँ होगा।
इस शेर के सुनने मात्र से ही खून गर्म हो उठता है। भगतसिंह को मेरा सत -सत प्रणाम।
रोहित (जामिया मिल्लिया इस्लामिया )
भगतसिंह का जन्म पंजाब में हुआ था। इनके अंदर बचपन से ही क्रन्तिकारी भावना थी । जब बचपन में इन्होने फसल देखा तब कहा था कि मैं इन खेतो में बंदूके बोया करूँगा ताकि अंग्रेजो को देश से भगा सकें। राजगुरु ,और सुखदेव के साथ भगत सिंह को फंसी दी गई थी। भगतसिंह गरमदल के नेता थे । उनका कहना था स्वंत्रता बिना लड़ाई के हासिल नहीं कि जा सकती। इन्होने जेल में अखबार कि मांग को लेकर भूख हरताल भी कि थी। उसके बाद से कैदियों को अख़बार मिलने लगा था । भगत सिंह बहादुर होने के साथ- साथ बुद्धिमान भी थे। २२ वर्ष कि उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाला ये वीर शहीदे -आज़म कहलाया।
अनूप वर्मा (जामिया मिल्लिया इस्लामिया )
मैं तो गांधीवादी हूँ। फिर भी भगतसिंह को पूजता हूँ। भगतसिंह आज़ादी कि लड़ाई के वो योद्धा रहे जिनके द्वारा युवाओं में फूंका गया जोश आज के युवाओं में भी पाया जाता है। शायद यही कारन है कि गांधीवादी होने के बाद भी आत्मसम्मान का हनन मुझे किसी भी कीमत पर मंज़ूर नहीं होगा चाहे थोड़े समय के लिए अहिंसा के मार्ग से हटना ही क्यों न पड़े । भगत सिंह समाज के लिए एक ज्योतिपुंज बन गए जिससे उस समय के युवाओं ने प्रेरणा ली आज के युवा प्रेरणा ले रहे हैं और शायद जब तक पृथ्वी है तब तक युवा इनसे प्रेरणा लेते रहेंगे।
जाहिर अब्बास (जामिया मिल्लिया इस्लामिया )
स्वंत्रता हर सुख से बढ़ कर है । स्वतंत्रता शारीर में आत्मा के सामान हैआज़ादी के इतिहास में जिन लोगों का नाम बड़े आदर से लिया जाता है उन्ही में से एक नाम अमर शहीद भगतसिंह का भी है। जब वे केवल ३ वर्ष के थे ,चचाजी उन्हें खेत में ले गए। उन्होंने ने देखा कि भगत सिंह मिटटी में कुछ कर रहा है,उन्होंने पूछा तो तुतलाते हुए भगतसिंह ने कहा कि बंदूके बो रहा हूँ .इस साहसी बालक ने जवान होते ही अंग्रजों कि ईट से ईट बजा दी। भगतसिंह के जीवन दर्शन से हमे बहुत कुछ सिखने को मिलता है। जिस समय भगत सिंह को फंसी कि सजा हो गई थी उस वक़्त भी उनके इरादे बुलंद थे।उन्होंने भारतमाता कि जय बोलते हुए फंदे को चूम कर अपनी क़ुरबानी दे दी।उनके शेर ने दुनिया वालों को देश भक्ति के नए मायने बताये।
दिल से न निकलेगी मरकर भी वतन कि उल्फत,
मेरी मिटटी से भी खुशबु-ऐ -वतन आएगी।

संतोष कुमार यादव (IETE)
हमारी इस धरा पर बहुत से अमर वीरों ने अपनी क़ुरबानी दी है । जिसमे भगतसिंह ऐसे ध्रुव तारे थे जिन्होंने अपनी जान कुर्बान कर आज़ादी कि रौशनी कर गए। वह अमर जवान जो आज़ादी के लिए ही इस धरती पर जन्मा था शायद । देशप्रेम का जज्बा उसमे कूट- कूट कर भरी हुई थी । युवावस्था में ही भगतसिंह को फंसी हो गई । वे इतने महान थे कि अपनी जीवन के अंतिम दिनों में अपनी फांसी के दिन का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.वे जानते थे कि इस देश कि जनता उन्हें खो कर जाग जाएगी और फिर आज़ादी पाना मुस्किल न होगा। ऐसा ही हुआ लोग अपनी स्वाधीनता कि मोल को पहचान गए फलतः भारत आजाद हुआ। और भगत सिंह का वो सपना साकार हुआ।
वीरेंदर कुमार (IETE)
भगत सिंह बचपन से ही देश क्र प्रति समर्पित हो गए थे । जब पहली बार पंजाब में आन्दोलन कि गति तेज हो गई थी तो वहां भी भगतसिंह ही नेतृत्व में थे। देशभक्ति के नशे में चूर इस क्रांतिकरी ने १९२३ में घर से भाग कर इस बात का संकेत दे चूका था कि इतिहास इसे स्वर्णाक्षरो में लिखेगा। पुरे देश के क्रांतिकारियों को एकजुट करना और युवाओं में क्रांति कि भावना जगाना भगतसिंह को खूब आता था.समाजवाद का उनका सपना आज भी पूरा नहीं हुआ। भगतसिंह को जिस बात का दर था वही हुआ -गोरे चले गए और कालों का शासन हो गया.केन्द्रीय अस्सेम्ब्ली में बबम फोरने के लिए भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को भेजा गया और यहीं से भगतसिंह ने बहरो को सुना दिया कि भारत अब आजाद हो के ही रहेगा।
मुकेश कुमार सिंह(IETE)
भगतसिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक जानामाना नाम है। एक ऐसी शख्सियत जिसे शहीद -ऐ- आज़म कि उपाधि दी गई। उनके लिए देश और देशवासी सर्वुपरी थे। भगतसिंह वर्तमान समय का भारत नहीं चाहते थे । यदि हम उनको पढ़ें तो यहपता चलता है को समाजवाद,समतावाद के प्रबल समर्थक थे। वे वर्गविहीन,समाजवादी भारत चाहते थे जहाँ भ्रस्ताचार और शोषण न हो।
भगतसिंह ने अपने साथियों के साथ मिल कर भारत के राजनैतिक आज़ादी के अलावा आर्थिक आज़ादी कि आवाज़ को भी बुलंद किया। अप्रैल १९२९ में अस्सेम्ब्ली में बम फेकने के साथ पुरे भारत में स्वतंत्रता के प्रति दीवानगी कि आग लगा दी। उहोने अपनी अंतिम समय तक लोगों को प्रेरणा देने का कम किया,और आज जब वो हमारे बिच नहीं हैं तब भी हम उनकी ज़िन्दगी से प्रेरणा लेते हैं ।

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