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खो गई लालू की लालिमा!

बिहार और लालू। एक समय में दोनों एक दूसरे के पर्याय माने जाते थे. प्रदेश की राजनीति में बादशाहत कायम करने वाले मसखरे-से भदेस नेता लालू प्रसाद यादव अब खामोश हैं. बीते विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की हुई जबरदस्त हार ने उन्हें हरिनाम याद दिला दिया है. बड़बोले लालू के मुंह बोल फूटते नहीं सुना जा रहा. इसे बिहारी राजनीति में दंबई के सूरज का डूबना माना जाता है. इस पराजय ने लालू के बड़बोलेपन पर ब्रेक ही नहीं लगाया है बल्कि उनके द्वंद्व को भी बढ़ा दिया है कि वे अपनी मसखरेपन वाली छवि को त्यागे या फिर “परिपक्व” राजनेता की तरह फिर से उठ खड़े हों. दोराहे पर खड़े लालू की यह सोच रही है कि गंवई अंदाज उन्हें जनता से सीधे जोड़ती है, वहीं उन्हें एक अ-गंभीर नेता के रूप में प्रस्तुत करती है. सिर्फ राजद ही नहीं बल्कि सूबे में यह फुसफुसाहट स्वर लेने लगी है कि अब लालू युग का अंत हो रहा है. इस युगांत की सुगबुगाहट लालू की लालिमा को धूमिल करने के क्रम में है और इसे वे भी बखूबी समझने लगे हैं. बेटे तेजस्वी को राजनीति के फलक पर ला कर अगली पीढ़ी में अपनी पहुंच बनाने की योजना पर लालू ने वैसे ही सोच को ...

चिदम्बरम का बयान

चिदम्बरम का बयान भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ अनेकता में एकता है। लेकिन राजनितिक दलों द्वारा बार-बार इसकी अखंडता को भंग करने साजिश रची जाती हैऔर कुछ हद तक उन्हें सफलता भी मिल जाती है। आज़ादी के बाद से आज तक भारत पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी अंग्रेजों की निति "फूट डालो शासन करो " के तर्ज़ पर काम करता आया है। बार-बार क्षेत्रवाद ,जातिवाद और धर्म के नाम लोगों को लड़ाया गया है ताकि उनका राजनितिक स्वार्थ पूरा होता रहे । मुंबई में राज ठाकरे जैसे लोगो को पैदा करने का काम भी कांग्रेस की रणनीति में शामिल होता है। वहां उम नके कन्धों पर बन्दूक रख कर तो असम में अपने एजेंटों के माध्यम से वो हिंदी भाषियों पर अत्याचार करवाती है ताकि वहां उसका वोपते बैंक बनता रहे। लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी भारत के अखंडता पर कोई खास असर नहीं पड़ा। एक बार फिर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बाद भारत के गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने ये कह कर की -दिल्ली में बढ़ रहे अपराध के लिए बहरी लोग जिम्मेवार हैं -इस बहस को ताज़ा कर दिया है। हालाँकि इस बयान के कारणों के दो मतलब हो सकते हैं। पहला...

सीबीआई निष्पक्ष नहीं

सीबीआई निष्पक्ष नहीं सीबीआई के लिए यह शर्म की बात है की माननीय सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़ा की सीबीआई निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के काम करे । इसका साफ़-साफ़ मतलब निकलता है की इससे पहले सीबीआई निष्पक्ष नहीं रही होगी या दबाव में काम कर रही होगी वर्ना सुप्रीम कोर्ट को ऐसा कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। अब सवाल यह उठता है की अगर सीबीआई निष्पक्ष और बिना किसी दबाव के काम करती तो विपक्ष उस पर ये आरोप नहीं लगता की सीबीआई SARकर द्वारा नियंत्रित हो रही है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 2G मामले की जांच सीबीआई को करने का आदेश दे दिया साथ ही यह भी कहा की जांच का निरिक्षण वो खुद करेगा। सीबीआई को समय-समय पर केस रिपोर्ट का अपडेट देने को कहा गया है। हालाँकि विपक्ष आज भी JPC की मांग पर अदा है। ऐसा कहा जा रहा है की एक बार फिर कांग्रेस का गला पकड़ा जा सकता था अगर JPC की जांच बिठाई जाती है तो देश के प्रधानमंत्री भी जांच के घेरे में आ रहे हैं। हालाँकि इस जांच से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई दर नहीं क्योंकि वो एक इमानदार किस्म के प्राणी हैं अगर दर है तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधीK ओ। ऐसा कहा जा रहा है की ...
भारत जैसे अखंड देश में जहाँ अनेकता में एकता है ,समय समय पर उसके एकता और अखंडता पर धारदार प्रहार भी किया गया लेकिन हर बार वार नाकामयाब ही रहा है । कभी मराठी,कभी असामी ,कभी बिहारी और पता नहीं क्या-क्या। सवाल ये है की ये सब करता कौन है,जवाब भी उतना ही आसन है आज़ादी क बीद से शासन कर रही कांग्रेस पार्टी । शुरू से ही फुट डालो शासन करो की निति पर चलने वाली ये पार्टी समय-समय पर एक ऐसा धमाका करना चाहती है जिससे देश की एकता प्रभावित हो और उनका राजनितिक उल्लू सीधा होता रहे। दिल्ली की मुख्यमंत्री शिला दीक्षित क बाद देश के गृहमंत्री चिदंबरम का ये बयां आना पार्टी के लिए शर्मनाक है जिसमे गृहमंत्री ने राजधानी में बढ़ रहे अपराध के लिए बहरी लोगो को ज़िम्मेदार ठहराया है। हलाकि इस बयां से सीधा-सीधा बिहारियों पर टिप्पणीकी गई है। इसके पीछे का दर्द भी समझा जा सकता है अभी-अभी बिहार में हुए विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को बिहार की जनता ने ज़ब्बर्दस्त पटकनी दी थी। गृहमंत्री की टिप्पणी में इस हर का दर्द भी साफ़ देखा जा सकता है। .मुंबई में राज ठाकरे जैसे लोगों को कांग्रेस ने इस्तेमाल किया । खैर ये सब राजनीती की अप...

सचिन को एक बार फिर सलाम

सचिन को एक बार फिर सलाम क्रिकेट का भगवान माने जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने एक बार फिर ये साबित कर दिया की वो सिर्फ अच्छे खिलाडी नहीं हैं बल्कि एक अच्छे इन्सान भी हैं। एक ओर जहाँ सारे खिलाडी Add के नाम पर मोटी से मोटी कमाई कर लेना चाहते हैं भले ही उनको किसी हानिकारक उत्पाद का ही add करना पड़े लेकिन दूसरी ओर सचिन जैसे महान खिलाडी ने ऐसा कदम उठा कर पुरे देश के सामने एक उदाहरण रखा है। उल्लेखनीय ये है की सचिन ने ये फैसला तब लिया जब भारतीय क्रिकेट कप्तान धोनी ने शराब के सबसे बड़े व्यापारी विजय माल्या के साथ 26 कड़ोर का deal किया है। मेरे हिसाब से youth icon बने फिर रहे ऐसे लोगो को अपनी जिम्मेदारियों का भी एहसास होना चाहिए। अगर आज प्रभाष जोशी जी होते तो सबसे ज्यादा ख़ुशी उन्हें ही होती.एक बार फिर सचिन को सलाम।
मैं जामिया में पत्रकारिता का छात्र हूँ । इसलिए मेरे क्लास में अक्सर किसी मुद्दे पर बात होती है । कल अपराध के मुद्दे पर बात होते -होते पाकिस्तान मुद्दे पर चली गई । कुछ लोगों का कहना था की एक लड़ाई जरुरी है कश्मीर मुद्दे क लिए। कुछ लोगो का कहना था की लड़ाई से कुछ भी भला नहीं होगा। मेरा ये मानना है की कभी- कभी लड़ाई भी ज़रूरी हो जाती है और कई मामले उसके बिना सुलझ ही नहीं सकते। मेरे साथी राय साब का ये मानना था की एक लड़ाई से देश कई साल पीछे चला जाता है। मैं खुद भी येही मानता हूँ लेकिन अगर इतिहास को देखा जाये तो जापान पूरी तरह बर्बाद हो चूका था लेकिन आज भारत से ही नहीं कई बड़े देशों से बहुत आगे है। देखते ही देखते बात-चीत बहस में तब्दील हो गया ,मैंने कहा-"कूटनीति ये कहती है की अगर कुछ नुकसान के बाद बहुत अच्छा परिणाम निकले जो उस नुकसान से बहुत बड़ा हो तो उस नुकसान को उठाने में कोई हर्ज़ नहीं। " ऐसा नहीं है की मैं कोई कुटनीतिज्ञ हूँ,लेकिन ये भजी सच है की कूटनीति के अनुसार ऐसा ही होता है। एक और सज्जन थे जिन्होंने कहा की गलती अटल जी की है कारगिल क वक़्त ही सेना चाहती तो...

नयी पत्रकारिता का दौर

उत्तरी अफ्रीका के तानाशाह देश ट्यूनीशिया से जो समाचार आ रहे हैं उसके अनेक आयाम और दूरगामी परिणाम हैं लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से एक और रुझान जुडा है जो पिछले कुछ वर्षों में प्रकाश में आया है और आज इस अफ्रीकी देश के नागरिक विद्रोह के बाद पटल पर आ गया है। ट्यूनीशिया के विद्रोह के राजनीतिक परिणाम और कारण हैं परंतु इस लेख की विषयवस्तु इसका राजनीतिक पक्ष नहीं है। इस विद्रोह का सबसे बडा कारण सोशल नेटवर्किंग जैसे फेसबुक और ट्वीटर के बाद आये सूचना विस्फोट से जोड कर देखा जा रहा है। तानाशाही और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के घोर प्रतिबंध के युग में जी रहे ट्यूनीशिया के लोगों के मध्य इन सोशल नेटवर्किंग साइट की पैठ ने न केवल जनता को सूचना उपलब्ध कराई वरन उन्हें सशक्त भी बनाया और उनका आत्मविश्वास भी बढाया। ट्यूनीशिया की इस घटना का संदर्भ इसलिये मह्त्वपूर्ण है कि अरब के देशो में अतिशय तानाशाही, आधुनिकता का अभाव और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की घोर कमी के चलते नागरिक प्रतिक्रिया सनसनीखेज रही लेकिन अन्य संदर्भों के लिये भी इसका कुछ संदेश अवश्य है। जिन देशों में लोकतंत्र है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान है वहाँ ...